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सोमवार, 10 जुलाई 2017

वैकल्पिक पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी

वैकल्पिक पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म (26 अक्टूबर, 1890) आश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947 को अपनी ननिहाल, इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में श्रीवास्तव (दूसरे) कायस्थ परिवार में हुआ। इनके पिता मुंशी जयनारायण हथगाँव, जिला फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। माता का नाम गोमती देवी था। पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। वहीं विद्यार्थी जी का बाल्यकाल बीता तथा शिक्षादीक्षा हुई। विद्यारंभ उर्दू से हुआ और 1905 ई. में भेलसा से अँगरेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 ई. में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में भर्ती हुए। उसी समय से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और इलाहाबाद के हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सयेग देने लगे। लगभग एक वर्ष कालेज में पढ़ने के बाद 1908 ई. में कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. मासिक की नौकरी की। परंतु अंग्रेज अफसर से झगड़ा हो जाने के कारण उसे छोड़कर पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर में 1910 ई. तक अध्यापकी की। इसी अवधि में सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय समय पर लेख लिख्ने लगे।
1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।
अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।
संपादन कार्य
इसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।
वर्ष 1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया।
हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।संपादन कार्यइसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए।
कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।
अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।संपादन कार्यइसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में हमारी आत्मोसर्गतानामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र 'सरस्वती' में उनका पहला लेख 'आत्मोसर्ग' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के उद्भूत, विद्धान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था।
वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र अभ्युदयसे भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके।प्रतापका प्रकाशनअपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से प्रतापनामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। इस समाचार पत्र के प्रथम अंक में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।
 विद्यार्थी जी ने अपने इस संकल्प को प्रताप में लिखे अग्रलेखों को अभिव्यक्त किया जिसके कारण अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा, जुर्माना किया और 22 अगस्त 1918 में प्रताप में प्रकाशित नानक सिंह की सौदा ए वतननामक कविता से नाराज अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाया व प्रतापका प्रकाशन बंद करवा दिया। आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर प्रताप की शुरूआत हो गई। प्रताप के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता प्रताप को आर्थिक सहयोग देने के लिए मुक्त हस्त से दान करने लगी। जनता के सहयोग से आर्थिक संकट हल हो जाने पर साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन 23 नवम्बर 1990 से दैनिक समाचार पत्र के रुप में किया जाने लगा। लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से प्रताप की पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन मजिस्टेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामें में प्रताप को बदनाम पत्रकी संज्ञा देकर जमानत की राशि जप्त कर ली। अंग्रेजों का कोपभाजन बने विद्यार्थी जी को 23 जुलाई 1921, 16 अक्टूबर 1921 में भी जेल की सजा दी गई परन्तु उन्होंने सरकार के विरुद्ध कलम की धार को कम नहीं किया। जेलयात्रा के दौरान उनकी भेंट माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुई।
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में हमारी आत्मोसर्गतानामक एक किताब लिख डाली थी।
वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र 'सरस्वती' में उनका पहला लेख 'आत्मोसर्ग' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के उद्भूत, विद्धान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र अभ्युदयसे भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके।
(...साभार)


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

वैकल्पिक मीडिया : अर्थ एवं अवधारणा

वैकल्पिक मीडिया: अर्थ एवं अवधारणा 
डॉ. रामशंकर 'विद्यार्थी'
जीवंत समाज के अभिन्न अंग के तीव्र वैचारिकता के प्रतिफल का नाम ही पत्रकारिता है। प्रसिद्ध संचारविद् मार्शल मैक्लुहान का कथन है कि- संचार के क्षेत्र में हर दिन कोई न कोई उपलब्धि हासिल की जाती है। ऐसे में मीडिया ने भी अपनी रंगत बदली है। आज पत्रकारिता के आयामों में बदलाव तो हुआ ही साथ ही उसके शस्त्र और औजारों में भी परिवर्तन हुआ। दुनिया भर में इक्कीसवीं सदी के लगभग प्रारंभ में एक खास मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ जिसे वैकल्पिक मीडिया के नाम से जाना जाता है।
मुख्यधारा की मीडिया के रूप में तमाम व्यवसायिक निहितार्थ वाले समाचार चैनल, अखबार घूम जाते हैं, जो दिन भर एक्सक्लूसिव के नाम पर अपना राग अलापते रहते हैं। इस भागमभाग की स्थिति ने हमें अनेक  समाचारों से वंचित कर दिया है। मुख्यधारा की मीडिया आज सारे समाज पर छायी हई है, किन्तु नीतिगत मसलों पर इसमें गंभीर सामग्री का एक सिरे से अभाव दिखाई देता है। नीतिगत एवं सामाजिक मसलों को मेनस्ट्रीम मीडिया सतही रूप में पेश करता है, जबकि गैर मुनाफे की मीडिया में सामाजिक मुद्दों का गंभीर विश्लेषण पढ़ने, देखने व समझने को मिलता है।

वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा
फ्रांस में सर्वप्रथम मई 1968 में छात्र और श्रमिकों के विद्रोह के बाद वैकल्पिक अख़बार दिखाई पड़ा। इसका प्रथम प्रकाशन 18 अप्रैल 1973 ई. को आया जिसमें इसके प्रकाश में आने का उल्लेख था हालांकि भारतीय संदर्भ में पत्रकारिता की शुरूआत (गांधी और अंबेडकर की पत्रकारिता) ही वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में हुई है। अतः इस शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में स्पष्टता नहीं है।
वैकल्पिक मीडिया में वैकल्पिक शब्द से तात्पर्य है कि वह सब जो मुख्यधारा के मीडिया के स्रोतों से प्राप्त न हो। वैकल्पिक मीडिया को पारिभाषित करते हुये कुछ तथ्य सामने आये हैं जो निम्नलिखित हैं-
“ऐसा समाचार प्रकाशक जो व्यापारिक न हो, उसके विचार या मुद्दे लाभ पर केंद्रित न हो, उसके विचारों एवं समाचारों के प्रकाशन का एक उद्देश्य हो।
उसके प्रकाशन की सामग्री पूर्णतः सामाजिक उत्तरदायित्व पर निर्भर हो। उसके लेखन में एक विशेष प्रकार का बोध होता हो।
समाचारों का प्रकाशन लगभग जनमानस को प्रेरित करने वाला हो।
वैकल्पिक मीडिया छोटे-छोटे उद्देश्यों पर केंद्रित रहता है। इसका कवरेज नियमित नहीं होता है।
प्रकाशन लगभग समाचार उपलब्धता पर केंद्रित रहता है।” (Pinzon,Ramirez ,‘Alternative Media: 2007)
समाज विज्ञान विश्वकोश के अनुसार- वैकल्पिकता किसी मीडिया की स्थिति जरूरी नहीं स्थायी ही हो। जैसे किसी मुद्दे को लेकर मीडिया के किसी भी वैकल्पिक माध्यम द्वारा किसी मुद्दे को मुखरता स्थापित की जा रही हो और मुद्दों की पूर्ति हो गयी हो तो वह मीडिया समाप्त भी हो सकता है या वह परिस्थिति सापेक्ष भी हो सकता है। मसलन, “किसी अधिनायकवादी सत्ता का विरोध कर रहे आंदोलन का दृष्टिकोण पेश करने वाला मीडिया वैकल्पिक की श्रेणी में माना जाता है। पर, उस सत्ता को अपदस्थ करके सरकार में आने वाली राजनीतिक ताकत का समर्थन करने वाला वही मीडिया वैकल्पिक होने का श्रेय लेने में नाकाम हो सकता है।” (समाज विज्ञान विश्वकोश, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि. वर्धा, पृष्ठ संख्या-1783)
राजस्थान विश्वविद्यालय में ‘नई चुनौतियाँ और वैकल्पिक मीडिया’ पर परिसंवाद में अनुराग चतुर्वेदी कहते हैं कि सीमांत लोगों की बात करना ही वैकल्पिक पत्रकारिता है, और यह बात जिस माध्यम से की जाय वे वैकल्पिक माध्यम के अंतर्गत आते हैं। 
वैकल्पिक मीडिया से आशय ऐसी मीडिया (समाचार पत्र-पत्रिका, रेडियो, टीवी सिनेमा व इंटरनेट आदि) से है, जो मुख्यधारा की मीडिया के प्रतिपक्ष में वैकल्पिक जानकारी प्रदान करती है। वैकल्पिक मीडिया को मुख्यधारा-मीडिया से हटकर देखा जाता है। वैकल्पिक मीडिया के अंतर्गत उन खबरों को प्रसारित किया जाता है, जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता है जबकि वे जन सरोकारों से पूर्णतः जुड़ी होती हैं। इसे विभिन्न माध्यमों में देखा जाता है। बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, दीवारों पर लिखे वक्तव्य, कैटलाग, कार्टून, मेले में लगी प्रदर्शनी, सामुदायिक रेडियो आदि वैकल्पिक मीडिया का अंग हो सकता हैं।


  

बुधवार, 17 मई 2017

मीडिया शोध : मात्रात्मक एवं गुणात्मक शोध



मीडिया शोध : मात्रात्मक एवं गुणात्मक शोध
मीडिया रिसर्च का मतलब समाचार पत्र, पत्रिका, समाचार समितियां, विज्ञापन, जनसंपर्क, रेडियों, टेलीविजन, इंटरनेट, निजी चैनल, संचार की पारंपरिक पद्धतियां आदि से संबंधित तथ्यों तथा घटनाओं के संदर्भ में ज्ञान प्राप्त करने से है। मीडिया रिसर्च तथ्यों व घटनाओं की जांच परीक्षण के लिए वैज्ञानिक पद्धतियां या प्रणालियों से की गई व्यवस्थित खोज है। जबकि सामाजिक रिसर्च का मतलब सामाजिक तथ्यों या घटनाओं से संबंधित ज्ञान प्राप्त करने के लिए की गई व्यवस्थित रिसर्च है।
मात्रात्मक शोध
 मात्रात्मक शोध निगमन पद्धति पर आधारित होती है यह शोध आंकड़ों पर आधारित होता है और इसका निष्कर्ष भी आंकड़ों द्वारा ही निर्धारित होता है। आंकड़ों के आधार पर एक नए आंकड़ें को निकालना ही मात्रात्मक शोध का उद्देश्य होता है। मात्रात्मक शोध किसी प्रकार के पक्ष या भाव से रहित रहता है। यह अपेक्षाकृत घटना और परिणाम या प्रभाव के बीच संबन्धों पर केंद्रित होता है और क्रिया और प्रतिक्रिया, घटना और परिणाम या प्रयोजन और प्रभाव से जुड़ा हुआ होता है ।   
निगमनात्मक सिद्धान्त:- यह पूर्व निर्मित सिद्धान्त होता है। सामान्य सत्य से तर्क द्वारा अज्ञात सत्य को प्रामाणित किया जाता है प्रायः ज्ञात सत्यों के आधार पर अज्ञात सत्य का निगमन होता है (अरस्तू)
गुणात्मक शोध
गुणात्मक शोध का उद्देश्य मानवीय व्यवहार और ऐसे व्यवहार को शासित करने वाले कारणों को गहराई से समझना है। गुणात्मक विधि न केवल क्या, कहां, कब की छानबीन करती है, बल्कि क्यों और कैसे को भी खोजती है। इसलिए, बड़े नमूनों की बजाय अक्सर छोटे पर संकेंद्रित नमूनों की ज़रूरत होती है। गुणात्मक शोध निर्देशन से कार्य करता है। गुणात्मक शोध में आमतौर पर अभिकल्प का प्रयोग नहीं करते, यह विकल्प खुले रखते है। गुणात्मक शोध बहुत लचीला होता है तथा चयन में अधिक स्वतंत्र रहता है। इस शोध में चरों का उनकें गुणों के आधार पर विशलेषण होता है। गुणात्मक शोध, मात्रात्मकता के स्थान पर व्यक्तिगत अनुभवों के विशलेषण पर जोर देता है। गुणात्मक शोध में शोध के निष्कर्ष में भाव एवं पक्ष को स्थान दिया जाता है यह कारण का विश्लेषण और सत्यापन करता है,गुणात्मक पक्ष को नापने के लिए  मुख्य रीतियों, व्यवस्थित शृंखला संबंध प्रमापन और संकेतकों  के आधार पर वर्गीकरणकरते है। मानव व्यवहार को गणित के सूत्रों में नहीं बाँधा जा सकता। इस मत के अनुसार, प्राकृतिक विज्ञानों के विकास में इतना महत्वपूर्ण योगदान देने वाला गणित, सामाजिक अनुसंधान में आवश्यक भूमिका नहीं रखता।
सरल शब्दों में- गुणात्मक से तात्पर्य है गैर संख्यात्मक डेटा संग्रहण या ग्राफ़ या डेटा स्रोत की विशेषताओं पर आधारित स्पष्टीकरण. उदाहरण के लिए, यदि आपसे विविध रंगों में प्रदर्शित थर्मल छवि को गुणात्मक दृष्टि से समझाने के लिए कहा जाता है, तो आप ताप के संख्यात्मक मान के बजाय रंगों के भेदों की व्याख्या करने लगेंगे.)
 आगमन सिद्धान्त:- किसी वस्तु या प्रक्रिया में जो वस्तु या प्रमाण मिलते है, उनका निरीक्षण किया जाता है और इस तरह अनेक सामान वस्तुओं और प्रक्रियाओं (प्रोसेस) में परिलक्षित विशेष तत्वों के आधार पर समान्य सिद्धान्त बनाये जाते है।
मात्रात्मक डेटा संग्रहण:-
मात्रात्मक शोध में मात्रा या सांख्यकीय में सूचना होती है। यह सर्वेक्षण, स्ट्रक्चर्ड इंटरव्यु, ऑब्जरवेशन, रिकार्ड्स और रिपोर्ट्स के रिव्यु का डेटा संग्रहण होता हैं । 
गुणात्मक डेटा संग्रहण:-
गुणात्मक शोधकर्ता डेटा संग्रहण के लिए कई अलग दृष्टिकोण अपना सकते हैं, जैसे कि बुनियादी सिद्धांत अभ्यास, आख्यान, कहानी सुनाना, शास्त्रीय नृवंशविज्ञान या प्रतिच्छाया. कार्य-अनुसंधान या कार्यकर्ता-नेटवर्क सिद्धांत जैसे अन्य सुव्यवस्थित दृष्टिकोण में भी गुणात्मक विधियां शिथिल रूप से मौजूद रहती हैं। संग्रहित डेटा प्रारूप में साक्षात्कार और सामूहिक चर्चाएं, प्रेक्षण और प्रतिबिंबित फील्ड नोट्स, विभिन्न पाठ, चित्र और अन्य सामग्री शामिल कर सकते हैं।

निगमन आगमन
निगमन पद्धति सिद्धांत केन्द्रित है आगमन पद्धति वास्तु केन्द्रित है
निगमन पद्धति में सामान्य सिद्धांत से विशेष तथ्य की ओर जाकर उसके गुणों का परिक्षण किया जाता है आगमन पद्धति में विशेष वस्तुओं के गुणों के आधार पर सामान्य सिद्धांत बनाये जाते हैं 
निगमन पद्धति में कुछ अनुमान से काम लिया जाता है आगमन पद्धति में केवल  तथ्यों को आधार बनाया जाता है
निगमन पद्धति में सैद्धांतिक कथन के रूप को आधार मान कर अन्य तत्वों की सत्यता को प्रमाणित या अप्रमाणि किया जाता है आगमन पद्धति में वस्तुओं का परिक्षण कर निर्णयों पर पहुँचा  जाता है
निगमन
आगमन
निगमन पद्धति सिद्धांत केन्द्रित है 
आगमन पद्धति वास्तु केन्द्रित है
निगमन पद्धति में सामान्य सिद्धांत से विशेष तथ्य की ओर जाकर उसके गुणों का परिक्षण किया जाता है
आगमन पद्धति में विशेष वस्तुओं के गुणों के आधार पर सामान्य सिद्धांत बनाये जाते हैं 
निगमन पद्धति में कुछ अनुमान से काम लिया जाता है
आगमन पद्धति में केवल  तथ्यों को आधार बनाया जाता है
निगमन पद्धति में सैद्धांतिक कथन के रूप को आधार मान कर अन्य तत्वों की सत्यता को प्रमाणित या अप्रमाणि किया जाता है
आगमन पद्धति में वस्तुओं का परिक्षण कर निर्णयों पर पहुँचा  जाता है



सोमवार, 24 अप्रैल 2017

मेरी रचनाएँ...

ढूंढ रहा हूँ...

कहाँ है मेरा अपना गाँव
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
कहाँ हैं मेरा वह स्कूल
जिसमें गुरु कराते अक्षर ज्ञान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
मेरा बचपन, वह मिडिल स्कूल 
जिसमें सिखाते , नैतिकता का ज्ञान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
आज वह धुंधली मेरी यादें
मांगती वही पुरानी शान 
मैं उसको ढूंढ रहा हूं।
दौड़ाते साईकिल का वह पहिया
छेड़ते अंताक्षरी की तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
खेलते अबेकस जैसा खेल
करते लुका-छिपी , चलाते गुलेल,
उड़ाते गौरैया और बटेर 
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
लौटा दो बचपन जैसा प्रेम 
रहते आपस में मिलजुल और सप्रेम
था मैं पैसों से अनजान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
मिले फिर मां की मीठी सी मुस्कान 
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
मैं बचपन ढूंढ रहा  हूँ।


साइकिल... 
कहाँ गायब कर दी तुमने साइकिल
हाँ वही साईकिल
जिसके टायर को दौड़ाकर
बचपन में उसके पीछे दौड़ा करते थे,
वही जिसे सीखते वक्त कई बार गिरे थे
चोट लगने पर फिर मुस्करा दिए
कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा,
बिखर गए थे मेरे अरमान
जब टूट गई थी उसकी 
ट्रिन ट्रिन करती घंटी। 
वही साईकिल जिसे 
 
ब्याह में पाकर खुश हुआ था श्यामू
साईकिल का साथ पाकर बढे थे बापू
जिस पर हम स्कूल जाते समय
लगाते थे तख्ती नाम की
और लिखते थे पर्यावरण मित्र 
@
रामशंकर विद्यार्थी