शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का एक वैचारिक मंच

अभिव्यक्ति के इस स्वछंद वैचारिक मंच पर सभी लेखनी महारत महानुभावों एवं स्वतंत्र ज्ञानग्राही सज्जनों का स्वागत है।

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

एक सरल संवादात्मक प्रक्रिया : टेलीकॉन्फ्रेंसिंग

एक सरल संवादात्मक प्रक्रिया : टेलीकॉन्फ्रेंसिंग
पृष्ठभूमि   
आज मानव समाज में तकनीक आधारित संचार हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। पूरा समाज तकनीक पर ही आधारित हो चुका है। एक पल में हम और आप दुनिया के एक भाग से दूसरे भाग को संचार तकनीक के द्वारा सिर्फ बात-चीत ही नहीं कर रहे हैं बल्कि एक-दूसरे-तीसरे के बीच एक साथ टेली, वीडियो, कंप्यूटर और अब मोबाइल कान्फ्रेंसिंग कर एक-दूसरे से अपनी बात आनलाइन और लाइव शेयर कर सकते है। संचार क्रांति ने साइबर स्पेस विलियम गिब्सन की फंतासी नहीं बल्कि वास्तविक दुनिया इसका हिस्सा बन चुकी है। आज टेली-मेडीसिन, टेली-डेमोक्रेसी, टेली-बिजनेस, टेली-शॉपिंग, साइबर सरवेंट आदि जीवन के हिस्सों के अंग बनते जा रहे हैं। आजकल कंप्यूटर, टेलीविजन और टेलीफोन द्वारा बैठक और संगोष्ठियाँ आयोजित करने का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।  
टेली कान्फ्रेंस-
टेलीकांफ्रेंसिंग एक इलेक्ट्रॉनिक साधन है जो एक विषय पर चर्चा करने के लिए दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित दो या दो से अधिक व्यक्तियों को एक साथ मिला सकता है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का अर्थ (meaning of teleconferencing)
   दूरवर्ती शिक्षा के लिए शैक्षिक टेलीकांफ्रेंसिंग एक महत्वपूर्ण माध्यम है।इसमें कई प्रकार के माध्यमो का प्रयोग किया जाता है और द्वि-पक्षीय प्रसारण द्वारा परस्पर कार्यशील सामूहिक सम्प्रेषण की सुविधा प्रदान की जाती है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का शाब्दिक अर्थ (Literal meaning)- टेलीकांफ्रेंसिंग शब्द को 'दूर संवाद प्रणाली' या ' दूर संभाषण प्रणाली' भी कहा जाता है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का अर्थ- एक दूसरे से दूर होते हुए भी प्रतियोगियों के बीच संवाद बनाये रखना है।टेली कान्फ्रेंसिंग का तात्पर्य दूरसंचार माध्यमों के द्वारा आयोजित होने वाले एक बैठक से होता है। यह इलेक्ट्रानिक्स तकनीकी साधनों द्वारा दो या अधिक स्थानों के बीच बैठे लोगों को जोड़ते हुए किसी मुद्दे पर बात-चीत के आयोजित है।
दूरसंचार साधनों द्वारा दो या दो से अधिक स्थानों पर तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का आपस में विचार-विमर्श करना टेली कान्फ्रेंस कहलाता है। संचार साधन के रूप में टेलीकान्फ्रेंसिंग तथा वीडियो कान्फ्रेंसिंग एक सशक्त माध्यम के रूप में सामने आया है। इसमें कई प्रकार के माध्यमों का प्रयोग किया जाता है और पारस्परिक समूह के द्वारा दो पक्षीय प्रसारण संप्रेषण की सुविधा होती है। सामान्यतः टेली कान्फ्रेंसिंग के सात प्रकार इस प्रकार निम्नलिखित हैं-
1.      आडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio Tele Conferencing)
2.      विडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Video Tele Conferencing)
3.      आडियो ग्राफिक टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio graphic Tele Conferencing)
4.      कंप्यूटर टेली कान्फ्रेंसिंग (Computer Tele Conferencing)
5.      मोबाइल कान्फ्रेंसिंग (Mobile Tele Conferencing)
प्रौद्दोगिकी के क्षेत्र के अनुसार इसके प्रयोग अलग-अलग है, लेकिन टेली कान्फ्रेंसिंग के कुछ सामान्य कारक निम्नलिखित है- एक दूरसंचार चैनल का उपयोग, कई स्थानों पर लोगों को लिंक करना, परस्पर द्वि-मार्गी संचार के लिए, सक्रिय भागीदारी आदि।
संवादात्मक तकनीक (Interactive Technologies)-
उपयोगकर्ता को जवाबी बात करने की क्षमता एवं नए सिस्टम के तहत अन्तरक्रियाशीलता का ज्ञान क्षमता बढ़ती है। इसके द्वारा हम उपग्रहों, कंप्यूटर, Tele text, View Data, कैसेट, केबल, और videodiscs सभी को एक उभरते पैटर्न में के रूप में देख सकते हैं। इससे व्यक्तियों, जन-दर्शकों के बीच  एक जानकारी दिया जा रहा है जो हमें इस प्रक्रिया में एक सक्रिय भूमिका लेने के लिए तरीके प्रदान करते हैं। इन प्रौद्दोगिकी के सहारे एक विशेष संदेश को बृहद स्तर पर दर्शकों के बीच प्रत्येक व्यक्ति के साथ बातचीत की जा सकती है।
1.      आडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio Tele Conferencing)-
आडियो कान्फ्रेंस में भाग लेने वाले व्यक्ति एक-दूसरे से बात-चीत कर सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को देख नहीं सकते हैं। इस प्रकार के कान्फ्रेंस सामान्यतः टेलीफोन के द्वारा आय फिर प्रथम जेनरेशन के मोबाइल द्वारा किए जाते है। इस टेली कान्फ्रेंसिंग में आवाज ही प्रमुख होता है और कभी कभी सम्मेलन बुला बुलाया। संवादात्मक टेलीफोन लाइनों के माध्यम से दूर-दराज के स्थानों में लोगों को जोड़ता है। सभी लाइनों को जोड़ने का ऑडियो एक पुल का काम का करता है। बैठक ऑडियो सम्मेलन के माध्यम से आयोजित किया जा सकता है। पूर्व की योजना बना, एक एजेंडा तय कर और समीक्षा बैठक भी की जा सकती है। दूरस्थ शिक्षा ऑडियो सम्मेलन द्वारा आयोजित किया जा सकता है। वास्तव में, यह उपयोग के तहत सबसे अधिक में से एक, अभी तक शिक्षा के लिए उपलब्ध लागत प्रभावी तरीकों है। अनुदेशक सबसे अच्छा दूरस्थ शिक्षा के अन्य रूपों को बढ़ाने के लिए ऑडियो सम्मेलनों का उपयोग करने के बारे में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।
2.      वीडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Video Tele Conferencing)-
विडियो कान्फ्रेंसिंग में भाग लेने वाले लोग एक-दूसरे को देख भी सकते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से बात भी कर सकते हैं। विडियो कान्फ्रेंसिंग और वीडियो चित्र प्रदान करने के लिए वीडियो को जोड़ती है। एक तरह से वीडियो / दो तरह से ऑडियो, या दो तरह से वीडियो / दो तरह से ऑडियो हो सकता है। यह एक टीवी कैमरे द्वारा कब्जा किया जा सकता है कि कुछ भी प्रदर्शित कर सकते हैं। इसमें लाभ चलती छवियों को प्रदर्शित करने की क्षमता है। दो तरह ऑडियो / वीडियो सिस्टम में, एक आम आवेदन का सामना करने वाली चेहरा बैठकों और कक्षाओं में जैसा दिखता है और दूरस्थ स्थलों पर प्रतिभागियों के चेहरे का भाव और शारीरिक आचरण देखने के लिए सक्षम बनाता है कि एक सामाजिक उपस्थिति बनाता है जो लोगों को दिखाने के लिए है। ग्राफिक्स समझ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग साइटों की एक संख्या को पढ़ाने वाले एक शिक्षक का उपयोग करने के लिए एक कारगर तरीका है। यह प्रत्येक साइट में नामांकित छात्रों की एक छोटी संख्या हो सकता है जो कक्षाओं के लिए प्रभावी बहुत लागत है। कई मामलों में, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, क्योंकि एक असामान्य विषय क्षेत्र में एक शिक्षक उपलब्ध कराने की लागत से अन्यथा समर्थित नहीं किया जा सकता है जो संस्था या कम होने के कारण नामांकन या करने के लिए रद्द कर दिया जाएगा जो पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के लिए संस्थानों के एक समूह के लिए सक्षम बनाता है।
आडियो ग्राफिक टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio graphic Tele Conferencing)-
इस तरह के संचार आवाज के लिए एक सहायक के रूप में ग्राफिक्स, अल्फा-अंकीय, दस्तावेजों, और वीडियो चित्र के रूप में दृश्य सूचना प्रेषित करने नैरोबैंड दूरसंचार चैनलों का उपयोग करता। अन्य नियम डेस्क टॉप कंप्यूटर कॉन्फ्रेंसिंग और बढ़ाया ऑडियो हैं। उपकरणों इलेक्ट्रॉनिक गोलियाँ / बोर्डों, फ्रीज फ्रेम वीडियो टर्मिनलों, एकीकृत ग्राफिक्स प्रणाली (पर्सनल कंप्यूटर के हिस्से के रूप में), फैक्स, रिमोट एक्सेस सूक्ष्मिका और स्लाइड प्रोजेक्टर, ऑप्टिकल ग्राफिक स्कैनर, और आवाज / डाटा टर्मिनलों में शामिल हैं। Audio graphics टेली कान्फ्रेंसिंग का आयोजन दूरस्थ शिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
3.         कंप्यूटर कान्फ्रेंस (Computer Tele Conferencing)-
कंप्यूटर कान्फ्रेंसिंग में लोग अलग-अलग स्थानों अपर बैठे व्यक्ति कंप्यूटर को प्रयोग में लाकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। दो या दो से अधिक कंप्यूटर और मोडेम कनेक्ट करने के लिए टेलीफोन लाइनों का उपयोग किया जाता है। एक कंप्यूटर पर भी किया जा सकता है और लाइनों पर भेजा जा सकता है। यह तुल्यकालिक या अतुल्यकालिक हो सकता है। एक अतुल्यकालिक विधा का एक उदाहरण इलेक्ट्रॉनिक मेल है। इलेक्ट्रॉनिक मेल (ई-मेल) का उपयोग करना, ज्ञापन, रिपोर्ट, अपडेट, न्यूज़लेटर लोकल एरिया नेटवर्क (लैन) या वाइड एरिया नेटवर्क (वैन) पर किसी को भी भेजा जा सकता है। सामान्य रूप से मुद्रित और फिर प्रतिकृति द्वारा भेजा जाता है जो कंप्यूटर पर उत्पन्न आइटम सूचना ई-मेल द्वारा भेजा जा सकता है।
कंप्यूटर के माध्यम से, शिक्षकों, छात्रों और प्रशासकों के लिए आसान एक दूसरे के लिए उपयोग के साथ ही पुस्तकालयों के माध्यम से प्रदान डेटाबेस संसाधनों का उपयोग किया है। पुस्तकालयों और विशेष संसाधनों की शैक्षिक संसाधनों ऐसे ओसीएलसी, एरिक, और इंटरनेट के रूप में पहुँचा जा सकता है। व्यवस्थापकों, छात्र फ़ाइलों का उपयोग ऐसे जिले या प्रणाली कार्यालयों, सरकारी एजेंसियों के रूप में केंद्रीय खजाने से संस्थागत जानकारी प्राप्त करें, या एक दूसरे के साथ संवाद कर सकते हैं। अन्य संसाधन ऐसे राज्य या संघीय कानून पर अद्यतन के रूप में बनाया जा सकता है।
4.         मोबाइल कान्फ्रेंसिंग (Mobile Tele Conferencing)-
मोबाइल कान्फ्रेंसिंग आज शहर उयर गाँवों के बीच की दूरी को कम कर दिया है। मोबाइल धारक को आज गाँव और शहर में मोबाइल कांफ्रेंसिंग करते हुए देखा जा सकता है। व्यवसाय के क्षेत्र में बहुत तेजी के साथ इसका प्रयोग किया जा रहा है।  मोबाइल कान्फ्रेंसिंग में एक साथ तीन-चार लोगों से बात किया जा सकता है। आज कल मोबाइल कान्फ्रेंस पर ही एक साथ कई मित्रों और नाते-रिश्तेदारों को बात करते हुए देखा गया है। आज यह सरल और उपयुक्त संसाधन बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी विषेशता यह है कि कहीं भी और किसी समय चाहे दिन हो या रात इसके माध्यम से हम कान्फ्रेंसिंग करते हैं। 
टेली कान्फ्रेंसिंग के उपयोग
यह बहुत ही अतुल्यकालिक हैं जो एक ही समय में व्यक्तियों के लिए सुविधाजनक समय पर एक संदेश भेजने या प्राप्त करता हैं। यह एक चर को समय पर काबू पाने और उसे प्रभावित करने के लिए संचार के रूप में किया जाता है। यह तकनीक वीडियो, डेटा और आवाज वितरण प्रणाली और यात्रा में लगने वाले समय और धन को कम कर देता है। सामग्री एक रिकार्डेड वीडियो या डिस्क में ले लिया जाता है समय को बचाया जाता है। रिकार्डेड सामग्री को किसी भी समय और कहीं पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है। इसे और अधिक संवादात्मक प्रौद्योगिकियों के रूप में एक स्वतंत्र शिक्षार्थी होने के मूल्य में वृद्धि होगी। यह तकनीक अनुसंधान के नई प्रौद्योगिकियों को सीखने के रूप में प्रभावी होता है। इससे बड़े समूहों तक एक ही जानकारी देने में प्रभावी होता है।
टेली कान्फ्रेंसिंग के लाभ
1.      समय की बचत होती है।
2.      कम लागत लगती है।
3.      एकता स्थापित करता है।
4.    इंटरएक्टिव मीडियम है।
टेलीकांफ्रेंसिंग की विशेषताएँ

1.      परस्पर क्रियाशील सम्प्रेषण-टेलीकांफ्रेंसिंग दो या दो से अधिक लोगों में परस्पर क्रियाशील सामूहिक सम्प्रेषण है।अनुभवों का आदान-प्रदान और दूरवर्ती शिक्षा का टेलीकांफ्रेंसिंग महत्वपूर्ण और उपयोगी अंग है।
2.      इलेक्ट्रॉनिक साधन-  टेलीकांफ्रेंसिंग एक इलेक्ट्रॉनिक साधन है।जो एक विषय पर चर्चा करने के लिए दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित दो या दो से अधिक व्यक्तियों को एक साथ मिला सकता है।
3.      भिन्न-भिन्न स्थान-टेलीकांफ्रेंसिंग दो या दो से अधिक स्थानों पर दो या दो से अधिक लोगों के बीच परस्पर क्रिया है।
4.      दूरवर्ती शिक्षा के लिए माध्यम - शेक्षिक टेलीकांफ्रेंसिंग दूरवर्ती शिक्षा के लिए विशेष रूप से उपयोगी माध्यम हो सकता है।


शनिवार, 30 सितंबर 2017

आज फिर जलेगा रावण

आज फिर जलेगा रावण
आज फिर जलेगा एक रावण
हाँ, वही रावण...
जिसे हमने ही बनाया है
लगाकर रंग-बिरंगी कागज,
जो बखान कर रहे हैं उसकी लोलुपता का।
दिखाया है अट्टहास करता उसका सौंदर्य,
जो उसकी क्रूरता का ही परिचायक है।  
बनाया है उसके दस मुंह,
जिसमें दिखाने का प्रयास किया है
उसकी बुराई
 असत्य
और नारी के असम्मान के प्रतीक का।
मगर न जाने क्यों मुझे हर साल जलाने पड़ते हैं रावण
क्यों नहीं मरता है मेरा रावण,
मेरे मन में बैठा वह रावण
जो किसी सीता को फिर चुरा लेना चाहता है
किसी राम से।
वह रावण जो सत्ता के मद में चूर
कर देना चाहता है अपनी ही बहन का संसार सूना।
वह रावण जो अपनी मनमानी के लिए
कर देना चाहता है भाई को अलग-थलग।
हाँ वही रावण तो मारना चाहता हूँ
जलाना चाहता हूँ।  
अट्टहास से गूंजता है रावण का स्वर
कहता है...
पहले मारो अपने अंदर के रावण को
जिसने मुझे पाला है, पोसा है।
तुमने ही तो मुझे अमरत्व दिया है, 
तुम ही तो बनाते हो मुझे,
हर वर्ष जलाने के लिए। 
रामशंकर 'विद्यार्थी'


सोमवार, 18 सितंबर 2017

शोध प्रारूप/प्ररचना/ डिजाइन: अवधारणात्मक अध्ययन

शोध प्रारूप/प्ररचना/ डिजाइन: अवधारणात्मक अध्ययन
संपादन- डॉ. रामशंकर विद्यार्थी
 अनुसंधान यानी शोध की विस्तृत कार्य योजना अथवा शोधकार्य प्रारंभ करने के पूर्व संपूर्ण शोध प्रक्रियाओं की एक स्पष्ट संरचना शोध प्रारूपया शोध अभिकल्पके रूप में जानी जाती है। शोध प्रारूप के संबंध में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह शोध का कोर्इ चरण नहीं है क्योंकि शोध के जो निर्धारित या मान्य चरण हैं, उन सभी पर वास्तविक कार्य प्रारंभ होने के पूर्व ही विस्तृत विचार होता है और तत्पश्चात प्रत्येक चरण से संबंधित विषय पर रणनीति तैयार की जाती है। जब संपूर्ण कार्य योजना विस्तृत रूप से संरचित हो जाती है तब वास्तविक शोध कार्य प्रारंभ होता है।
एफ.एन. करलिंगर के अनुसार, ‘‘शोध प्रारुप अनुसंधान के लिए कल्पित एक योजना, एक संरचना तथा एक प्रणाली है, जिसका एकमात्र प्रयोजन शोध सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना तथा प्रसरणों का नियंत्रण करना होता है।’’
पी.वी. यंग  के अनुसार, ‘‘क्या, कहाँ, कब, कितना, किस तरीके से इत्यादि के संबंध में निर्णय लेने के लिए किया गया विचार अध्ययन की योजना या अध्ययन प्रारूप का निर्माण करता है।’’
आर.एल. एकॉफ  के अनुसार, ‘‘निर्णय लिये जाने वाली परिस्थिति उत्पन्न होने के पूर्व ही निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रारुप कहते हैं।’’
स्पष्ट है कि शोध प्रारूप प्रस्तावित शोध की ऐसी रूपरेखा होती है, जिसे वास्तविक शोध कार्य को प्रारंभ करने के पूर्व व्यापक रूप से सोच-समझ के पश्चात तैयार  किया जाता है। शोध की प्रस्तावित रूपरेखा का निर्धारण अनेकों बिन्दुओं पर विचारोपरान्त किया जाता है। इसे सरलतम रूप में पी.वी. यंग (1977) ने शोध संबंधित विविध प्रश्नों के द्वारा इस तरह स्पष्ट किया है-
ü अध्ययन किससे संबंधित है और आँकड़ों का प्रकार जिनकी आवश्यकता है?
ü अध्ययन क्यों किया जा रहा है?
ü वांछित आँकड़े कहाँ से मिलेंगे?
ü कहाँ या किस क्षेत्र में अध्ययन किया जायेगा?
ü कब या कितना समय अध्ययन में सम्मिलित होगा?
ü कितनी सामग्री या कितने केसों की आवश्यकता होगी?
ü चुनावों के किन आधारों का प्रयोग होगा?
ü आँकड़ा संकलन की कौन सी प्रविधि का चुनाव किया जायेगा?
इस तरह, निर्णय लेने में जिन विविध प्रश्नों पर विचार किया जाता है जैसे क्या, कहाँ, कब, कितना, किस साधन से अध्ययन की योजना निर्धारित करते हैं। पी.वी. यंग ने वॉट इज सोशल रिसर्च, पृष्ठ 9-10) में शोध प्रारूप और शोध प्रारूप बनाम पद्धति विषय पर विधिवत विचार व्यक्त किया गया है। उनके अनुसार शोध प्रारूप को भवन निर्माण से संबंधित एक उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। भवन निर्माण करते समय सामग्री का आर्डर देने या प्रोजेक्ट पूर्ण होने की तिथि निर्धारित करने का कोर्इ औचित्य नहीं है, जब तक कि हमें यह न मालूम हो कि किस प्रकार का भवन निर्मित होना है। पहला निर्णय यह करना है कि क्या हमें अति ऊँचे कार्यालयी भवन की, या मशीनों के निर्माण के लिए एक फैक्टरी की, एक स्कूल, एक आवासीय भवन या एक बहुखण्डीय भवन की आवश्यकता है। जब तक यह नहीं तय हो जाता हम एक योजना का खाका तैयार नहीं कर सकते, कार्य योजना तैयार नहीं कर सकते या सामग्री का आर्डर नहीं दे सकते हैं। इसी तरह से, सामाजिक अनुसन्धान को प्रारूप या अभिकल्प की आवश्यकता होती है या तथ्य संकलन के पूर्व या विश्लेषण शुरू करने के पूर्व एक संरचना की आवश्यकता होती है। एक शोध प्रारूप मात्र एक कार्य योजना (वर्क प्लान) नहीं है। यह प्रोजेक्ट को पूर्ण करने के लिए क्या करना है कि कार्य योजना का विस्तृत विवरण है। शोध प्रारूप का प्रकार्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राप्त साक्ष्य हमें प्रारम्भिक प्रश्नों के यथासम्भव सुस्पष्ट उत्तर देने में सक्षम बनाये।
कार्य योजना बनाने के पूर्व या सामग्री आर्डर करने के पूर्व भवन निर्माता या वास्तुविद् को प्रथमत: यह निर्धारित करना जरूरी है कि किस प्रकार के भवन की जरूरत है, इसका उपयोग क्या होगा और उसमें रहने वाले लोगों की क्या आवश्यकताएं हैं। कार्य योजना इससे निकलती है। इसी तरह से, सामाजिक अनुसन्धान में निदर्शन, तथ्य संकलन की पद्धति (उदाहरण के लिए प्रश्नावली, अवलोकन, दस्तावेज विश्लेषण) प्रश्नों के प्रारूप के मुद्दे सभी इस विषय के कि मुझे कौन से साक्ष्य इकट्ठे करने हैं’, के सहायक/पूरक होते हैं।

गेराल्ड आर. लेस्ली का कहते हैं कि, ‘शोध प्रारूप ब्लू प्रिन्ट है, जो परिवर्त्यों को पहचानता और तथ्यों को एकत्र करने तथा उनका विवरण देने के लिए की जाने वाली कार्य प्रणालियों को अभिव्यक्त करता है।शोध प्रारुप को अत्यन्त विस्तार से समझाते हुए सौमेन्द्र पटनायक ने लिखा है कि, ‘शोध प्रारुप एक प्रकार की रूपरेखा है, जिसे आपको शोध के वास्तविक क्रियान्वयन से पहले तैयार करना है। योजनाबद्ध रूप से तैयार एक खाका होता है जो उस रीति को बतलाता है जिसमें आपने अपने शोध की कार्य योजना तैयार की है। आपके पास अपने शोध कार्य पर दो पहलुओं से विचार करने का विकल्प है, नामत: अनुभवजन्य पहलू और विश्लेषणपरक पहलू। ये दोनों ही पहलू एक साथ आपके मस्तिष्क में रहते हैं, जबकि व्यवहार में आपको अपना शोध कार्य दो चरणों में नियोजित करना है : एक सामग्री संग्रहण का चरण और दूसरा उस सामग्री के विश्लेषण का चरण। आपकी मनोगत सैद्धान्तिक उन्मुखता और अवधारणात्मक प्रतिदर्शताएँ आपको इस शोध सामग्री के स्वरूप को निर्धारित करने में मदद करती हैं जो आपको एकत्र करनी है और कुछ हद तक यह समझने में भी कि आपको उन्हें कैसे एकत्र करना है। तदोपरान्त, अपनी सामग्री का विश्लेषण करते समय फिर से आमतौर पर समाजिक यथार्थ सम्बन्धी सैद्धान्तिक और अवधारणात्मक समझ के सहारे आपको अपने शोध परिणामों को स्पष्ट करने में और प्रस्तुत करने के वास्ते शोध सामग्री को वर्गीकृत करने में और विन्यास विशेष को पहचानने में दिशानिर्देशन मिलता है।
पीवी यंग जी का कहना है कि, ‘‘जब एक सामान्य वैज्ञानिक मॉडल को विविध कार्यविधियों में परिणत किया जाता है तो शोध प्रारुप की उत्पत्ति होती है। शोध प्रारुप उपलब्ध समय, कर्म शक्ति एवं धन, तथ्यों की उपलब्धता उस सीमा तक जहाँ तक यह वांछित या सम्भव हो उन लोगों एवं सामाजिक संगठनों पर थोपना जो तथ्य उपलब्ध करायेंगे, के अनुरूप होना चाहिए।’’
र्इ.ए. सचमैन  का कहना है कि, ‘एकल या सहीप्रारुप जैसा कुछ नही है शोध प्रारुप सामाजिक शोध में आने वाले बहुत से व्यावहारिक विचारों के कारण आदेशित समझौते का प्रतिनिधित्व करता है। . . . . (साथ ही) अलग-अलग कार्यकर्त्ता अलग-अलग प्रारुप अपनी पद्वतिशास्त्रीय एवं सैद्धान्तिक प्रतिस्थापनाओं के पक्ष में लेकर आते हैं . . . . एक शोध प्रारुप विचलन का अनुसरण किए बिना कोर्इ उच्च विशिष्ट योजना नही है, अपितु सही दिशा में रखने के लिए मार्गदर्शक स्तम्भों की श्रेणी है।

दूसरे शब्दों में, एक शोध प्रारुप काम चलाऊ होता है। अध्ययन जैसे-जैसे प्रगति करता है, नये पक्ष, नर्इ दशाएं और तथ्यों में नयी संबंधित कड़ियाँ प्रकाश में आती हैं, और परिस्थितियों की माँग के अनुसार यह आवश्यक होता है कि योजना परिवर्तित कर दी जाये। योजना का लचीला होना जरूरी होता है। लचीलेपन का अभाव संपूर्ण अध्ययन की उपयोगिता को समाप्त कर सकता है।
शोध प्रारूप के प्रकार
शोध प्रारुपों के कर्इ प्रकार होते हैं। विविध विद्वानों ने शोध प्रारुपों के कुछ तो एक समान और कुछ अलग प्रकार के प्रकारों का उल्लेख किया है-
1.       ऐतिहासिक शोध प्रारुप (Historical Research Design)
2.       वैयक्तिक और क्षेत्र शोध प्रारुप (Case and Field Research Design)
3.       विवरणात्मक या सर्वेक्षण शोध प्रारुप (Descriptive or Survey Research Design)
4.       सह सम्बन्धात्मक या प्रत्याशित शोध प्रारुप ( Correlational or Prospective Research Design)
5.       कारणात्मक, तुलनात्मक या एक्स पोस्ट फैक्टों शोध प्रारुप (Causal Comparative or Ex- Post Facto Research Design)
6.       विकासात्मक या समय श्रेणी शोध प्रारुप (Developmental or Time Series Research Design)
7.       प्रयोगात्मक शोध प्रारुप (Experimental Research Design)
8.       अर्द्ध प्रयोगात्मक शोध प्रारुप (Quasi Experimental Research Design)
अन्य चार प्रकार के शोध प्रारुपों का उल्लेख किया गया है-
1.       प्रयोगात्मक (Experimental)
2.       वैयक्तिक अध्ययन (Case Study)
3.       अनुलम्ब प्रारूप (Longitudinal)
4.       अनुप्रस्थ काट प्रारुप (Cross-Sectional Design)
कुछ विद्वानों ने अनेकों प्रकारों का उल्लेख किया है। जो कुछ भी हो मोटे तौर पर शोध प्रारुपों को चार महत्वपूर्ण प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है-
1.       विवरणात्मक प्रारुप या वर्णनात्मक शोध प्रारुप।
2.       व्याख्यात्मक प्रारुप
3.       अनवेषणात्मक प्रारुप, और
4.       प्रयोगात्मक प्रारुप
किसी विशिष्ट प्रारूप का चयन शोध की प्रकृति पर मुख्यत: निर्भर करता है। कौन सी सूचना चाहिए, कितनी विश्वसनीय सूचना चाहिए, प्रारूप की उपयुक्तता क्या है, लागत कितनी आयेगी, इत्यादि कारकों पर भी प्रारूप चयन निर्भर करता है।
1. विवरणात्मक या वर्णनात्मक शोध प्रारूप
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस प्रारुप में अध्ययन विषय़ के संबंध में प्राप्त सभी प्राथमिक तथ्यों का यथावत् विवरण प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रारुप का मुख्य उद्देश्य अध्ययन की जा रही इकार्इ, संस्था, घटना, समुदाय या समाज इत्यादि से संबंधित पक्षों का हूबहू वर्णन किया जाता है। यह प्रारूप वैसे तो अत्यन्त सरल लगता है किन्तु यह दृढ़ एवं अलचीला होता है इसमें विशेष सावधानी अपेक्षित होती है। इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि निदर्शन पर्याप्त एवं प्रतिनिधित्वपूर्ण हो। प्राथमिक तथ्य संकलन की प्रविधि सटीक हो तथा प्राथमिक तथ्य संकलन में किसी भी प्रकार से पूर्वाग्रह या मिथ्या झुकाव न आने पाये। अध्ययन समस्या के विषय में व्यापक तथ्यों को इकठ्ठा किया जाता है, इसलिए ऐसी सतर्कता बरतनी चाहिए कि अनुपयोगी एवं अनावश्यक तथ्यों का संकलन न होने पाये। अध्ययन पूर्ण एवं यथार्थ हो और अध्ययन समस्या का वास्तविक चित्रण हो इसके लिए विश्वसनीय तथ्यों का होना नितान्त आवश्यक है।
वर्णनात्मक शोध का उद्देश्य मात्र अध्ययन समस्या का विवरण प्रस्तुत करना होता है। इसमें नवीन तथ्यों की खोज या कार्य-कारण व्याख्या पर जोर नहीं दिया जाता है। इस प्रारुप में किसी प्रकार करके प्रयोग भी नही किए जाते हैं। इसमें अधिकांशत: सम्भावित निदर्शन का ही प्रयोग किया जाता है। इसमें तथ्यों के विश्लेषण में क्लिष्ट सांख्यिकीय विधियों का भी प्रयोग सामान्यत: नहीं किया जाता है।
इसमें शोध विषय के बारे में शोधकर्ता को अपेक्षाकृत यथेष्ट जानकारी रहती है इसलिए वह शोध संचालन सम्बन्धी निर्णयों को पहले ही निर्धारित कर लेता है। वर्णनात्मक शोध प्रारूप के अलग से कोर्इ चरण नही होते हैं। सामान्यत: सामाजिक अनुसंधान के जो चरण हैं, उन्हीं का इसमें पालन किया जाता है। संपूर्ण एकत्रित प्राथमिक सामग्री के आधार पर ही अध्ययन संबंधित निष्कर्ष निकाले जाते हैं एवं आवश्यकतानुसार सामान्यीकरण प्रस्तुत किये जाने का प्रयास किया जाता है।
2. व्याख्यात्मक शोध प्रारूप
शोध समस्या की कारण सहित व्याख्या करने वाला प्रारूप व्याख्यात्मक शोध प्रारुप कहलाता है। व्याख्यात्मक शोध प्रारुप की प्रकृति प्राकृतिक विज्ञानों की प्रकृति के समान ही होती है, जिसमें किसी भी वस्तु, घटना या परिस्थिति का विश्लेषण ठोस कारणों के आधार पर किया जाता है। सामाजिक तथ्यों की कार्य-कारण व्याख्या यह प्रारूप करता है। इस प्रारुप में विविध उपकल्पनाओं का परीक्षण किया जाता है तथा परिवत्र्यों में संबंध और सहसंबंध ढूढ़ने का प्रयास किया जाता है।
3. अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप
जब सामाजिक अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य अध्ययन समस्या के संबंध में नवीन तथ्यों को उद्घाटित करना हो तो इस प्रारुप का प्रयोग किया जाता है। इसमें अध्ययन समस्या के वास्तविक कारकों एवं तथ्यों का पता नही होता है। अध्ययन के द्वारा उनका पता लगाया जाता है। चूँकि इसमें कुछ नयाखोजा जाता है इसलिए इसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारुप कहा जाता है। इस प्रारूप द्वारा सिद्धान्त का निर्माण होता है।
कभी-कभी अन्वेषणात्मक और व्याख्यात्मक शोध प्रारुप को एक ही मान लिया जाता है। कर्इ विद्वानों ने तो व्याख्यात्मक शोध प्रारुप का उल्लेख तक नहीं किया है। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो यह कहा जा सकता है कि जिस सामाजिक शोध में कार्य- कारण सम्बन्धों पर बल देने की कोशिश की जाती है, वह व्याख्यात्मक शोध प्रारुप के अन्तर्गत आता है, और जिसमें नवीन तथ्यों या कारणों द्वारा विषय को स्पष्ट किया जाता है, उसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारुप के अन्तर्गत रखते हैं। इसमें शोधकर्ता को अध्ययन विषय के बारे में सूचना नही रहती है। द्वैतियक स्रोतों के द्वारा भी वह उसके विषय में सीमित ज्ञान ही प्राप्त कर पाता है। अज्ञात तथ्यों की खोज करने के कारण या विषय के संबंध में अपूर्ण ज्ञान रखने के कारण इस प्रकार के शोध प्रारुप में सामान्यत: उपकल्पनाएँ निर्मित नहीं की जाती हैं। उपकल्पनाओं के स्थान पर शोध प्रश्नों का निर्माण किया जाता है और उन्हीं शोध प्रश्नों के उत्तरों की खोज द्वारा शोध कार्य सम्पन्न किया जाता है।
विलियम जिकमण्ड ने अन्वेषणात्मक शोध के तीन उद्देश्यों का वर्णन किया है (1) परिस्थिति का निदान करना (2) विकल्पों को छाँटना तथा, (3) नये विचारों की खोज करना। सरन्ताकोस (1988) के अनुसार सम्भाव्यता, सुपरिचितिकरण, नवीन विचार, समस्या के निरुपण तथा परिचालनीकरण के कारण अन्वेषणात्मक शोध प्रारुप को अपनाया जाता है। वास्तव में जहोदा तथा अन्य ने ठीक ही कहा है कि, ‘‘अन्वेषणात्मक अनुसन्धान अनुभव को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है जो कि अधिक निश्चित खोज के लिए उपयुक्त उपकल्पना के निर्माण में सहायक हो।’’
सामाजिक समस्या के अन्तर्निहित कारणों को खोजने के कारण कारण इस प्रारुप में लचीलापन होना जरुरी है। इसमें तथ्यों की प्रकृति अधिकांशत: गुणात्मक होती है, इसलिए अधिक से अधिक तथ्यों एवं सूचनाओं को प्राप्त करने की कोशिश की जाती है। तथ्य संकलन की प्रविधि इसकी प्रकृति के अनुरूप ही होनी चाहिए। समय और साधन का भी ध्यान रखना चाहिए।
4. प्रयोगात्मक शोध प्रारुप
ऐसा शोध प्रारुप जिसमें अध्ययन समस्या के विश्लेषण हेतु किसी न किसी प्रकार का प्रयोगसमाहित हो, प्रयोगात्मक शोध प्रारुप कहलाता है। यह प्रारुप नियंत्रित स्थिति में जैसे कि प्रयोगशालाओं में ज्यादा उपयुक्त होता है। सामाजिक अध्ययनों में सामान्यत: प्रयोगशालाओं का प्रयोग नही होता है। उनमें नियंत्रित समूह और अनियंत्रित समूहों के आधार पर प्रयोग किये जाते हैं। इस प्रकार के प्रारुप का प्रयोग ग्रामीण समाजशास्त्र और विशेषकर कृषि सम्बन्धी अध्ययनों में ज्यादा होता है। वैसे औद्योगिक समाजशास्त्र में वेस्टन इलेक्ट्रिक कम्पनी के हाथोर्न वक्र्स में हुए प्रयोग काफी चर्चित रहे हैं। ग्रामीण प्रयोगात्मक अध्ययनों में प्रयोगों के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि संचार माध्यमों का क्या प्रभाव पड़ रहा है, योजनाओं का लाभ लेने वालों और न लेने वालों की सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति में क्या अन्तर आया है, इत्यादि इत्यादि। इसी प्रकार के बहुत से विषयों/प्रभावों को इस प्रारूप के द्वारा स्पष्ट करने की कोशिश की जाती है। परिवत्र्यों के बीच कारणात्मक सम्बन्धों का परीक्षण इसके द्वारा प्रामाणिक तरीके से हो पाता है।








सोमवार, 10 जुलाई 2017

वैकल्पिक पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी

वैकल्पिक पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म (26 अक्टूबर, 1890) आश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947 को अपनी ननिहाल, इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में श्रीवास्तव (दूसरे) कायस्थ परिवार में हुआ। इनके पिता मुंशी जयनारायण हथगाँव, जिला फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। माता का नाम गोमती देवी था। पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। वहीं विद्यार्थी जी का बाल्यकाल बीता तथा शिक्षादीक्षा हुई। विद्यारंभ उर्दू से हुआ और 1905 ई. में भेलसा से अँगरेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 ई. में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में भर्ती हुए। उसी समय से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और इलाहाबाद के हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सयेग देने लगे। लगभग एक वर्ष कालेज में पढ़ने के बाद 1908 ई. में कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. मासिक की नौकरी की। परंतु अंग्रेज अफसर से झगड़ा हो जाने के कारण उसे छोड़कर पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर में 1910 ई. तक अध्यापकी की। इसी अवधि में सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय समय पर लेख लिख्ने लगे।
1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।
अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।
संपादन कार्य
इसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।
वर्ष 1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया।
हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।संपादन कार्यइसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए।
कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।
साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।
अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई।संपादन कार्यइसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया था।
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में हमारी आत्मोसर्गतानामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र 'सरस्वती' में उनका पहला लेख 'आत्मोसर्ग' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के उद्भूत, विद्धान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था।
वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र अभ्युदयसे भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके।प्रतापका प्रकाशनअपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से प्रतापनामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। इस समाचार पत्र के प्रथम अंक में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।
 विद्यार्थी जी ने अपने इस संकल्प को प्रताप में लिखे अग्रलेखों को अभिव्यक्त किया जिसके कारण अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा, जुर्माना किया और 22 अगस्त 1918 में प्रताप में प्रकाशित नानक सिंह की सौदा ए वतननामक कविता से नाराज अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाया व प्रतापका प्रकाशन बंद करवा दिया। आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर प्रताप की शुरूआत हो गई। प्रताप के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता प्रताप को आर्थिक सहयोग देने के लिए मुक्त हस्त से दान करने लगी। जनता के सहयोग से आर्थिक संकट हल हो जाने पर साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन 23 नवम्बर 1990 से दैनिक समाचार पत्र के रुप में किया जाने लगा। लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से प्रताप की पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन मजिस्टेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामें में प्रताप को बदनाम पत्रकी संज्ञा देकर जमानत की राशि जप्त कर ली। अंग्रेजों का कोपभाजन बने विद्यार्थी जी को 23 जुलाई 1921, 16 अक्टूबर 1921 में भी जेल की सजा दी गई परन्तु उन्होंने सरकार के विरुद्ध कलम की धार को कम नहीं किया। जेलयात्रा के दौरान उनकी भेंट माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुई।
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में हमारी आत्मोसर्गतानामक एक किताब लिख डाली थी।
वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र 'सरस्वती' में उनका पहला लेख 'आत्मोसर्ग' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के उद्भूत, विद्धान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र अभ्युदयसे भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके।
(...साभार)